Search This Blog

Monday, 25 September 2017

ये ब़ूंदे कहां हैं थकती

करने कोआचमन,
धरा पर जो टपकती
ये ब़ूंदे कहां हैं थकती
अम्बरौ से जो बरसती

नदिया जहाँ है बहती
खिलखिल ये बरसती
मोती हो जैसे कोई
लहरौ का शिगांर करती

करने कोआचमन,
धरा पर जो टपकती
ये ब़ूंदे कहां हैं थकती
अम्बरौ से जो बरसती

नदियाँ  जैसे है  बहती
संग संग है चलती
आशा की  ले पतवार
सागर मे खो है जाती

करने कोआचमन,
धरा पर जो टपकती
ये ब़ूंदे कहां हैं थकती
अम्बरौ से जो बरसती

गंवा कर सब कुछ अपना
मीलौ यह चली
धुप की  तपिश में
अम्बरौ से फिर जा मिली

करने कोआचमन,
धरा पर जो टपकती
ये ब़ूंदे कहां हैं थकती
अम्बरौ से जो बरसती

संदीप खोसला
www.ownmyviews.blogspot.com

Rain drops

Kiss of delight falling from height Drops dance insane in rain
seive retrieve
Riding waves flow
Where the river goes
In ocean
Holding molten Sun
Rise again
For one more slide
Journey infinite
To be and away
From where they come
Drops.. Never die