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Saturday, 17 January 2015

मै आजाद होना चाहता।

रेत की तरह फिसल,

सागर में खो जाती है।

मै जितना करीब आता  हूँ,

वो और दुर जाती  है।

यह दूरियाँ मजबूरियां है मेरी,

अक्सर कुछ  हसरतें अधुरी रह जाती है।

एक दर्द मेरे सीने मे होता है,

क्यु कोई रहनुमा ना मिला मुझको,

क्यु मै गुमनामियो मे रहता हु।

यह जो तनहाईया है मेरी,

मेरे खयालों मे चली आती है।

अपनी चाहतो को विराम देना चाहता  हु,

नींद की आगोश मे आराम चाहता हूँ।

मै आजाद होना चाहता हूँ।

हर पल लपकना चाहता हूँ,

लम्हे जीना चाहता हूँ।

जिक्र ना हो गुजरे वक्त का,

यु गुजरना चाहता हूँ।

फिर से जीना चाहता हूँ।

मै आजाद होना चाहता।