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Tuesday, 2 December 2014

शहर को अपने पहले सा बना दे

एक सा लगता था शहर तेरा,

जब दिल में रब बसता था,

अब तो कहीं,

मंदिर कहीं मस्जिद,

कहीं गिरजा ,गुरूद्वारा हो गया,

धर्म प्रयाण तेरा शहर क्या हुआ,

कहीं हिन्दु कहीं मुस्लिम,

तो कहीं सरदारों का मोहल्ला हो गया।

बेमिसाल मेरा रसूल है,

मुरीद मुरशिद के मेरे है हजारों,

यु नाम की तिजारत आम हो रहीं,

माटी शहर की तेरे लाल हो गई।

घर को आग लगा  तेरे,

वो अपनी गलियां रोशन कर रहे,

बहा के खुन तेरा रंगोली सजा रहे।

टुट कर बिखर जाए, उस कांच की तरह खिलवाड कर रहे,

यु शहर को तेरे तार तार कर रहे।

आग तेरे घर तक ना पहुंच पाए,

इसलिए बाहर लगा नाम मिटा दे।

दिल मे बसा रब को,

लबो में खामोशी पिरो ले।

सींच मुहब्बत से अपने शहर की माटी को,

बरगद फिर प्यार वाला लगा दे।

दीवारें मजहब की गिरा दे,

शहर को अपने फिर पहला सा बना दे।