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Monday, 8 September 2014

माँ

जब बोलना भी न आता था,


जब तोतली जुबान मे बतलाता,


मां सब समझ लेती थी।


जब चलना भी न आता था,


गिर गिर कर संभलना सीखता  था,


अंगुली पकड चलना मां सिखाती।


रातों को जाग लोरी सुनाती,


मां सपनो की भाषा भी जानती थी।


तपते बदन को,


शीतल स्पर्श देना जानती थी माँ।


बिन कहे सब कुछ समझती,


माँ खामोशी की भाषा भी जानती थी।


नन्हे कदमों को लंबी छलांग,


लगवाना जानती थी माँ।


उमर ढलते बुढी माँ हो गई,


चलने फिरने, दिखने सुनने मे अक्षम,


 खामोश कदमो की आहट,


अब भी सुन लेती है माँ।


नजर कमजोर हो गई,


पर भीड मे भी चेहरा पहचानती है माँ।


खामोश  खामोशी,


दिल की किताब पढ लेती है माँ।


वो संपुर्ण नारी,


जीवन पथ की राहो की,


एक परिभाषा एक आशा है माँ।